ज़िंदगी कुछ इस तरह ख़ामोशियों से भर गई,
जीते थे जिन ख़्वाबों के सहारे, वो कहीं अब रह गए।
आँसुओं से भरी महफ़िल में, जाने क्यों अकेले रह गए,
अब तो बस अश्क-ए-शाम है, इसकी हर जाम में बह गए।
जीते थे जिन ख़्वाबों के सहारे, वो कहीं अब रह गए।
आँसुओं से भरी महफ़िल में, जाने क्यों अकेले रह गए,
अब तो बस अश्क-ए-शाम है, इसकी हर जाम में बह गए।
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