poet shire

poetry blog.

Saturday, March 15, 2025

सिमरन की माला

सिमरन की माला सांसों में लिए
कांटो के दामन में चलते रहे,
आपको याद करते, और दिन गुज़रते रहे,
रात खामोशियों से गुफ्तगू में बीत जाती,अक्सर
और तन्हाईयों से रिश्ते गहरे होते रहे।

एक सदी सी गुज़री है अभी अभी
पर इन आँखों में नमी है वैसी हिं 
लोग कहते रहे कि ज़ुल्म सहते हो क्यों?
और हम ज़ुल्म की बेबसी पे हँसते रहे।

No comments:

Post a Comment

ads