आतिशी बाज़ियां दिल करने लगा,
आज फिर आपने जो गुनगुनाया।
महफ़िलों में रौनक है आपके होने से,
ये सफ़र इतना भी तन्हा न रहा अब।
गुलबांग-ए-मुहब्बत में सजी एक वफ़ा,
आंधी सी चली आज।
लुट गए गुलफ़ाम-ए-मुहब्बत की हंसी उड़ाने वाले,
और हम फ़कीरी में शहज़ादे हो गए।
फ़रमान-ए-इश्क़ की तकीद तलब कर,
महरूमियों की फ़कीरी में न बसर हो।
इत्तिला-ए-दिल-ए-दिल्लगी,
फिर नाचीज़ न हो।
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